लखनऊ न्यूज डेस्क: लखनऊ के जानकीपुरम में एक सेवानिवृत्त बुजुर्ग के साथ डिजिटल अरेस्ट और साइबर ठगी की एक चौंकाने वाली घटना सामने आई है। 85 वर्षीय बदरुद्दीन अंसारी को जालसाजों ने पुलिस और एटीएस अधिकारी बनकर करीब 27 दिनों तक मानसिक बंधक बनाए रखा और उनसे 84.50 लाख रुपये ठग लिए। पीड़ित की शिकायत पर साइबर थाना पुलिस ने मामला दर्ज कर पड़ताल शुरू कर दी है।
साजिश और डिजिटल अरेस्ट का तरीका:
फर्जी पहचान: ठगों ने खुद को लखनऊ मुख्यालय का सीनियर इंस्पेक्टर प्रमोद कुमार मिश्रा बताकर पीड़ित को कॉल किया। उन्होंने दावा किया कि बदरुद्दीन के नाम पर पुणे में एक मनी लॉन्ड्रिंग केस दर्ज है।
दस्तावेजों का जाल: बुजुर्ग को विश्वास में लेने के लिए व्हाट्सएप और सिग्नल ऐप पर एनआईए (NIA), सुप्रीम कोर्ट और आरबीआई (RBI) के फर्जी लेटरहेड वाले दस्तावेज भेजे गए।
मानसिक दबाव: 11 मार्च से 4 अप्रैल 2026 के बीच आरोपियों ने गिरफ्तारी का डर दिखाकर उन्हें किसी से भी बात करने से मना कर दिया और अलग-अलग किश्तों में कुल 84.50 लाख रुपये ट्रांसफर करवा लिए।
पुलिस की कार्रवाई और रिकवरी:
ठगी का अहसास होने पर पीड़ित ने साइबर थाने में गुहार लगाई। साइबर थाना प्रभारी बृजेश यादव के अनुसार, पुलिस ने तत्काल सक्रियता दिखाते हुए ठगों के बैंक खातों को चिन्हित किया और उनमें मौजूद 27 लाख रुपये फ्रीज करा दिए हैं। शेष राशि और आरोपियों का पता लगाने के लिए तकनीकी सर्विलांस की मदद ली जा रही है।
सावधानी और चेतावनी:
पुलिस ने नागरिकों को आगाह किया है कि कोई भी सरकारी एजेंसी या पुलिस अधिकारी व्हाट्सएप कॉल के जरिए किसी को 'डिजिटल अरेस्ट' नहीं करता है। यदि कोई व्यक्ति खुद को अधिकारी बताकर डराए या पैसे की मांग करे, तो तुरंत नजदीकी थाने या साइबर हेल्पलाइन नंबर पर सूचित करें।