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हेल्थ इंश्योरेंस का प्रीमियम भरते रहे, फिर भी क्लेम अटका, ये 7 गलतियां मत करना!

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Posted On:Friday, January 2, 2026

हेल्थ इंश्योरेंस (Health Insurance) खरीदना आज के समय में विलासिता नहीं बल्कि एक अनिवार्य जरूरत बन गया है। हम अक्सर पॉलिसी यह सोचकर खरीदते हैं कि अब अस्पताल के खर्चों की चिंता खत्म हो गई। लेकिन, पॉलिसी के दस्तावेजों में छिपे 'नियम और शर्तें' क्लेम के समय ऐसी बाधाएं खड़ी करती हैं कि मरीज के साथ-साथ परिवार का मानसिक तनाव भी बढ़ जाता है। अक्सर लोगों को अहसास होता है कि क्लेम रिजेक्ट होने या कम मिलने की वजह उनकी अपनी पुरानी गलतियां हैं।

यहाँ हम उन 7 आम गलतियों का विश्लेषण करेंगे जो क्लेम के समय आपको भारी वित्तीय झटका दे सकती हैं:

1. रूम रेंट लिमिट और 'प्रोपोर्शनेट डिडक्शन' का जाल

ज्यादातर लोग सोचते हैं कि 5 या 10 लाख का कवर है तो किसी भी कमरे में भर्ती हुआ जा सकता है। असल में, कई पॉलिसियों में रूम रेंट पर 1% या 2% की सीमा होती है। यदि आप लिमिट से महंगा कमरा चुनते हैं, तो इंश्योरेंस कंपनी केवल कमरे का ही नहीं, बल्कि डॉक्टर की फीस, सर्जरी और अन्य सभी खर्चों में भी उसी अनुपात में कटौती (Proportionate Deduction) करती है। अंत में, आपको बिल का एक बड़ा हिस्सा अपनी जेब से देना पड़ता है।

2. वेटिंग पीरियड की अनदेखी

सिर्फ पुरानी बीमारियां (Pre-existing Diseases) ही नहीं, बल्कि कई सामान्य सर्जरी जैसे मोतियाबिंद, हर्निया, या पथरी (Stone) के लिए भी 2 से 4 साल का 'स्पेसिफिक वेटिंग पीरियड' होता है। लोग अक्सर पॉलिसी लेते समय यह नहीं पूछते कि किन बीमारियों का कवर कितने समय बाद शुरू होगा, और जब अचानक सर्जरी की नौबत आती है, तो क्लेम खारिज हो जाता है।

3. मेडिकल हिस्ट्री छुपाना या 'नॉन-डिस्क्लोजर'

अक्सर एजेंट या ग्राहक जल्दी में अपनी पुरानी स्वास्थ्य समस्याओं (जैसे हल्का ब्लड प्रेशर या पुरानी दवाइयां) को छिपा लेते हैं या बताना जरूरी नहीं समझते। लेकिन क्लेम के समय अस्पताल की रिपोर्ट में जब इन पुरानी स्थितियों का जिक्र आता है, तो कंपनी इसे 'तथ्यों को छिपाना' मानकर न केवल क्लेम खारिज कर सकती है, बल्कि आपकी पॉलिसी भी रद्द कर सकती है।

4. केवल 'ग्रुप इंश्योरेंस' (ऑफिस पॉलिसी) के भरोसे रहना

कंपनी द्वारा दिया गया इंश्योरेंस तब तक ही साथ है जब तक आप वहां नौकरी कर रहे हैं। नौकरी बदलने, रिटायरमेंट या करियर ब्रेक के दौरान आप बिना किसी कवर के होते हैं। यदि आप 45-50 की उम्र में नई पर्सनल पॉलिसी लेते हैं, तो प्रीमियम बहुत ज्यादा होता है और वेटिंग पीरियड फिर से शून्य से शुरू होता है। इसलिए, ऑफिस की पॉलिसी के साथ एक छोटी व्यक्तिगत पॉलिसी होना सुरक्षा के लिए अनिवार्य है।

5. कैशलेस इलाज को गारंटी मान लेना

कैशलेस सुविधा एक सुविधा है, अधिकार नहीं। इसके लिए प्री-अथॉराइजेशन की प्रक्रिया जरूरी है। यदि अस्पताल ने समय पर दस्तावेज नहीं भेजे या इंश्योरेंस कंपनी को कुछ संदेह हुआ, तो वह कैशलेस रिक्वेस्ट रिजेक्ट कर सकती है। ऐसी स्थिति में आपको पहले खुद भुगतान करना पड़ता है और फिर बाद में 'रिइंबर्समेंट' के लिए लंबी कागजी कार्रवाई करनी पड़ती है।

6. पॉलिसी रिन्यूअल में देरी (पॉलिसी का लैप्स होना)

रिन्यूअल की तारीख भूलना सबसे घातक गलती है। यदि आप ग्रेस पीरियड (30 दिन) भी चूक जाते हैं, तो आपकी पॉलिसी लैप्स हो जाती है। इसका मतलब है कि पिछले सालों में जो आपने वेटिंग पीरियड पूरा किया था, वह सब बेकार हो जाता है। नई पॉलिसी लेने पर आपको फिर से पहले दिन से शुरुआत करनी होगी और 'नो क्लेम बोनस' (NCB) का लाभ भी खत्म हो जाएगा।

7. महंगाई के मुकाबले कम सम इंश्योर्ड

आज के दौर में चिकित्सा महंगाई (Medical Inflation) 12-14% की दर से बढ़ रही है। 3-4 साल पहले लिया गया 3 लाख का कवर आज के आईसीयू और आधुनिक इलाज के खर्चों के लिए नाकाफी है। कम कवर होने की वजह से इलाज के बीच में ही लिमिट खत्म हो जाती है, जिससे परिवार पर अचानक आर्थिक बोझ बढ़ जाता है।


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