लखनऊ न्यूज डेस्क: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश की निचली अदालतों में लंबित अंतिम रिपोर्टों (फाइनल रिपोर्ट) को लेकर गंभीर चिंता जताई है। अदालत ने कहा कि सिर्फ लखनऊ न्यायिक क्षेत्र में ही करीब 50 हजार फाइनल रिपोर्ट आदेश के इंतजार में लंबित हैं। कोर्ट ने इसे आपराधिक न्याय व्यवस्था के लिए चिंताजनक बताते हुए प्रदेश के सभी जिला एवं सत्र न्यायाधीशों से जिलेवार रिपोर्ट तलब की है।
यह आदेश न्यायमूर्ति तेज प्रताप तिवारी की एकल पीठ ने जालसाजी और आपराधिक विश्वासघात से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान दिया। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि पुलिस ने जुलाई 2020 में ही फाइनल रिपोर्ट दाखिल कर दी थी, लेकिन अब तक उस पर कोई अंतिम आदेश नहीं हुआ। इससे उनके पासपोर्ट के नवीनीकरण और विदेश यात्रा में भी दिक्कतें आ रही हैं।
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने कहा कि फाइनल रिपोर्ट दाखिल होने के बाद उस पर समय रहते फैसला करना संबंधित पीठासीन अधिकारी की जिम्मेदारी है। अदालत ने टिप्पणी की कि कई मामलों में देरी पक्षकारों की वजह से नहीं, बल्कि पीठासीन अधिकारियों की उदासीनता के कारण हो रही है। कोर्ट ने कहा कि ऐसी लंबित फाइनल रिपोर्टें न्याय प्रक्रिया को प्रभावित करती हैं और आरोपियों को अनावश्यक परेशानी झेलनी पड़ती है।
हाईकोर्ट ने सभी जिला एवं सत्र न्यायाधीशों को निर्देश दिया है कि वे अपने-अपने जिले में लंबित फाइनल रिपोर्टों की समीक्षा करें, पुराने मामलों को प्राथमिकता दें और लंबित मामलों के निस्तारण के लिए ठोस कार्ययोजना तैयार करें। अदालत ने यह भी पूछा है कि प्रत्येक जिले में कितनी फाइनल रिपोर्ट लंबित हैं, देरी की वजह क्या है और उन्हें जल्द निपटाने के लिए क्या कदम उठाए गए हैं। मामले की अगली सुनवाई 20 अगस्त 2026 को होगी।